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for those who have to celebrate their "दिवाली", without Light...



दिवाली

दुलहन सी सजी हैं दुकानें
चमकती कंडिलें महकते पकवान...
हर तरफ तांता लगा है लोगों का...
लाखों आये हैं,जलसे मे मेहमान।।।

अब आतिशबाजियां हुई शुरू...
बजते पटाखे और उड़ते जहाज...
होता है हड़कंप, ऐसे ना कभी भी...
लगता है जैसे.... “दिवाली” है आज।।।

लोग यहाँ मदमस्त नाचते...
ढोल नगाड़े, बेखौफ बजाते...

मिलकर गले सब,खुशियाँ मानते...
जलाके फुलझड़ियाँ,आँखे चौधाते।।।

मैं भी टटोलती,कोने झुग्गी के...
जहां कभी, संभाला था 'दीया'...
पर देगा कोई..क्या तेल दीये-भर?
या रहेगा अंधेरा..फिर आशियाना मेरा...।।।

my LIFE...

Why are you so IMperfEct....

never obey me...
Just you wander without taking care, the fences I have made... So that will be remain inside of my arena...
you never think... if some day you will flew away far from me, then how will i even sought your name... without having my Life in me.

Aren't you aware that you are "My Life"....


But honestly; although i'm a little teased...
but i like the Way You Are.
The way you follow my Heart and beats with it....without caring my rules...
it makes me feel Alive... nourish me...spark my Creativity...
and often dips me into your Love...

So My Sweetheart... tease me more.
Be a little more PERFECT....IMperFeCtly...
I Love You... <3 <3 <3

a JOURNEY...

It’s a JOURNEY… and we are ‘blind passengers’, sitting in the train…
A train that passes through station to station…

Though it stops at every station… so that we will ‘identify ours’ and will alight over it…
But unfortunately, even hearing the noise of vendors and people over there… we could not see, at which we have reached.
It is not that, we can’t ask to the person sitting beside of us… but what can be the worse…
“He is also BLIND.”
This way we travel for our whole life…just in delusion that someday someone will come to us to let us know, that ‘we are reached’…
but not everyone is not fortunate enough to have this privilege…
May someday we will break our ‘numbness’ and will make noise for the DESTINATION we have to reach…
And although it would be wrong, but we will dare to come down on a PLATFORM…!!!

प्यार


मुश्किल है ये कितना मुझको...
लिख देना उन जज्बातों को...
लगता है की छुप जातें हैं...
जब खोजता हूँ उन लफ्जों को ||

वैसे तो बहुत बदनाम हैं...
ये प्यार करने वाले सब...
फिर बढती क्यूँ है प्यास मगर...
एक दिलबर के दीदार को ||

क्यूँ लगता है फिर मीठा ये...
जो दर्द कभीवो, हमको दे दे...
गर ना हो प्यार तो नफरत ही...
कुछ तो कभी वो हमसे कहदे...
क्यों है इतना दीवानापन...
देते हैं भुला हम खुद ही को...
और लगता है खो जाती हैं...
जब खोजते हैं इन वजहों को ||

खुशियाँ अपनी रम जाती हैं...
उसकी दुनिया की खुशियों में...
दिल कहता है की छीन ले...
गम उसके तू हर कीमत पे...
है किया इजाद हमने या फिर...
लेगा खुदा ही इस ज़िम्मे को ||

क्यूँ मुश्किल है इतना मुझको...
लिख देना उन जज्बातों को...
क्यूँ.. लगता है छुप जातें हैं...
जब खोजता हूँ उन लफ्जों को ||


अभय कुमार

Music of life

Music of life is very soothing.
It’s relaxing like I’m sitting in deep forest and sweet slow breeze touching my face, combing my hairs, and murmuring something in my ear…
Everlasting feeling with unbreakable relaxation….
All I need to LISTEN silently…
Every layer peel out one by one,
Daily rush, useless fuss… her ignorance, work hindrance…and so forth.
Ultimately a beautiful light comes up… twinkling, full of color…
 all it want me to close my eyes… to SEE…the brilliance.
Slowly it takes me into the ocean of peace… infinitely deep, extremely calm, without a single ripple…
Everything is trace and drowning inside…

Telling me… to not just remain stand on the bank…but to dive…to fathom the depth…to drown in JOY…

मानवता के लिए एक प्रयास

क्यों न पसीजे ये दिल, जब आंकड़े 10, 20, 50 से बड़ते बड़ते 2000, 4000 , 5000  पहुचने लगें | ये किसी शेयर के दाम नहीं, बल्कि हम जैसे लोगों की जिंदगियो के आंकड़े हैं | हमारे बिलकुल पास नेपाल में, हमारे ही लोग, प्रकृती के कहर का मूल्य चूका रहे हैं, और हम यहाँ IPL की मस्ती और दोस्तों के संग ठिठोलियो में रमें हैं |
या तो ऐसी घटनाएँ हमारे लिए अब आम हो गईं हैं, या फिर हमारी संवेदनाये नम पड़ गई हैं | पर जो भी हो, जरा सोचिये क्या बीतती होगी उस 8 साल के बच्चे पर जो, मलबे में दबी अपनी मरी माँ से उठने की जिद कर रहा है या कोई बाप जो अपने बच्चे के एक आंसू नहीं देख सकता, आज उसकी एक सिसक सुनने की आस में बैठा है | 
    ऐसा नहीं की हम सब काम-धाम छोड़ के वहा चले जाएँ, पर क्या कुछ पल हम उनके लिए प्रार्थना नहीं कर सकते | क्या हम FB पे एक POST उनके नाम की नही डाल सकते , अपनी जेब से चंद रुपये उनके लिए नहीं निकाल सकते |
    मानवता के लिए हम कुछ तो संवेदनशील हों | क्या पता हमरा कोई प्रयास किसी पीड़ित के आंसू पोछ सके |||

PLEASE SUPPORT NEPAL

खुदा

अनोखा ये एहसास है, खुद में मिल जाने का...
कमियों के बीच कहीं, पूरा सा दीखता हूँ...
व्यथाए कुछ कम हैं, द्वेष भी नहीं रहा ...
लगता है जैसे की, खुद को पा लिया ||


अब ना अकेला हूँ, जिन्दगी के सफ़र में...
जज्बा भी कहीं अब दीखता नहीं टूटता...
विश्वाश की डोर ये, कही तो बधीं है...
लगता है जैसे की, खुद को मैंने पा लिया ||

अब ना है निराशा, ना ही तो कमी है...
जवाब हर सवाल का, मुझमे ही कहीं है...
करम ये तेरा है, मेरा कुछ भी नहीं.... ऐ खुदा !!
लगता है जैसे की, तुझको मैंने पा लिया ||

                                    अभय कुमार
                                    १६ अप्रैल २०१५


समंदर

कहीं मैयत, तो कहीं महफ़िलें देखता हूँ...
कहीं धोखा तो कहीं लोग सच्चे देखता हूँ...
कहीं खिलती आँखे, तो कहीं आंसू देखता हूँ...
कहीं आलिशान महल तो कहीं ठिठुरते बच्चे देखता हूँ |

कहीं बेबस बुढ़ापा तो कहीं मधहोश जवानी देखता हूँ...
कहीं टूटते ख्वाब तो कहीं बुलंदियां झुकते देखता हूँ...
कहीं मोहोबत्त तो कहीं लम्बी रंजिशे देखता हूँ...
शांत वादियों में भी कभी बस्तियां लुटते देखता हूँ ||

कहीं अटूट विश्वाश तो कहीं टूटते मंदिर देखता हूँ...
घनघोर अंधेरों में भी कभी उजियारे अन्दर देखता हूँ...
देखता हूँ कभी, उफनती इस सागर की लहरों को...
बंद आँखों से कभी, खुद में ये समंदर देखता हूँ |||

By.... अभय कुमार
4 feb 2015

वेदना

कितनी दर्द भरी होती है ये वेदना, बैचैन करने वाली। एक भयंकर अन्तर्दव्न्द पैदा कर देती है। और कितनी निष्ठुर भी होती है, कारण पूछो तो मूँह पे ताला लगा लेती है। क्यूँ आयी है तू यहाँ? क्या चाह्ती है मुझसे? पर ज्यों ही एसा कोइ सवाल उससे पूछ्ता हूँ। अपना मूँह फ़ेर के बैठ जाती है। पर मै जानता हूं क्यूं आती है वो यहां, वो आती है, इस कोलाहल मे थोड़ी शान्ती पाने को; इस अँधेरे मे थोड़ी रोशनी पाने को। पर भटक जाती है, और भी अशान्त हो जाती है। सोचती है; शायद ये अँधेरा थोड़ा छट जाये, पर दुर्भाग्य! क्या मिलता है उसे, शान्ती के नाम पे बस सन्नाटे, और रोशनी के नाम पे बस वो बिखरे चिराग ! बस यही तो मिलता है उसे …॥

जो निश्चल है, हर पल समर्पित है… उस माँ को मेरी "अभिव्यक्ति" समर्पित ॥


अभिव्यक्ति

ना मिलते मुझको शब्द कोई,
जिससे तुझको मैं व्यक्त करूं।
माँ तू है एक अनन्त कोई,
कैसे खुद को अभिव्यक्त करूं॥

तेरी निश्चल सी वो आंखें,
गर दर्द मुझे हो, रोती हैं।
फ़िर हंसता मुझको देखकर,
खुद यूं ही वो हंस देती हैं।
उन आंखों की खुशी के लिये,
हर पल को मैं अर्पण करूं,
माँ तू है एक अनन्त कोई,
कैसे खुद को अभिव्यक्त करूं॥

                                 तेरी कोमल सी वो बातें,
                              सहलायें मेरी हर सांसें।
  लोरी तेरी गूंजें हर पल,
सहमायें जब मुझको रातें।
तेरे मुख के हर शब्दों को,
दिल में अपने ही मैं भर लूं।
माँ तू है एक अनन्त कोई,
कैसे खुद को अभिव्यक्त करूं॥

सह पाती ना एक आह मेरी,
हर दर्द मेरा पी लेती तू।
जब कभी मुझे ठोकर लगती,
झट से गोदी ले लेती तू।
माँ दर्द कभी ले के तेरा,
अपना जीवन साकार करूं।
माँ तू है एक अनन्त कोई,
कैसे खुद को अभिव्यक्त करूं॥

मैं रहूं सफ़ल इस जीवन में,
तू करती है बस आस यही।
जब गिरे कभी विश्वास मेरा,
आती मुझको बस याद तू ही।
आशीष तेरा हर पल मुझपे,
कैसे यूं ही पथ से भटकूं।
माँ तू है एक अनन्त कोई,
कैसे खुद को अभिव्यक्त करूं॥

माँ शब्द तू ही, है अर्थ तू ही,
है जीवन का आधार तू ही।
माँ ब्रम्ह तू ही, आनन्द तू ही,
मैं हूं इसकी भी वजह तू ही।
तू रहे सदा इस दुनिया में,
इन सांसों पे सिमरन करूं।
माँ सच मे है, अनन्त कोई…
कैसे इसको अभिव्यक्त करूं॥

“ये पक्तियाँ मेरी माँ को समर्पित”
अभय कुमार

वो चाहत ही है, जो अंधेरी आंखों मे, उजाला भर देती है…वो चाहत ही है,जो खो जाय तो, इन आंखों मे आँसूओ का समंदर भर देती है॥

आँसू

शब्दों की तलाश मे, ये रात गुजर जायेगी…

कुछ बातों की आस मे, कायनात बदल जायेगी…

जब चाहतों की उसकी, सौगात चली जायेगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

इन रात के अंधेरों मे, मै रह रहा सा था कहीं…

तू प्यार का एक दीप जला, इक उजियारा सा कर गई…

जब लौ को बचाने मे, हथेलियां सुलग जायेंगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

प्यासा राही बनकर मै, भटकता रहा उन राहों में…

तू अक्सर मुझको प्रेम का, एक प्याला पिला जाती थी…

जब राहों से ओस की, वह बूदें सूख जायेंगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

भीड़ की आवाज भी, जब अनसुनी सी थी कहीं…

तब आहटों को भी तूने, इन सासों मे बसा दिया…

जब घुंघरुओ की छ्नछनाहट, ये आँगन छोड़ जायेगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

एहसास ना था धूप का, इस जलन का, उस आग का…

पर तेरे एक स्पर्श  ने, इस रूह को सहला दिया…

जब चाँद की शीतलता भी, इक ऊष्णता बन जायेगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

ना चाहता था जानना, इस मौसम को आकाश को…

ना तनहाइयों का फ़ीकापन, ना साथ की मिठास को…

जब दर्द भरे संसार मै, तू मुझको छोड़ जायेगी…

फ़िर ना चीखेंगे आंसू, पर, ये सांसे रूठ जायेंगी…॥


अभय कुमार

Limits are not, what we assume somtimes... these are far beyond. Depends on our will-power... My Poem "Despair" is an conversation b/w me and a young tree...

   "Despair"

I went through words in a winter’s eve...
To a young tree, seemed, to fall soon...
I asked, if you want some revival drops...
Before you sucked by the cold moon...


He opened eyes by hearing that.
“I’ve not so wishes before my Gone,
Striving is not I’ve fallen in Despair...
You’ll see, I’m breathing an Another Dawn.” 

abhay kumar
11-12-11

Got a triumph in college... 1st position in Kavi Sammelan-11. Really thankful to LITERARY COMMITTEE. for this recognition....


abhay@kavi sammelan-11 "सांसें" 
A video of final day of Kavi-Sammelan. My poem "सांसें" is a story of a son, leaving this materialistic world, and giving a consolation to her mother with his last breaths, that even if i'm no longer with you, yet you will not be defeated... You will live this life, with all happiness and hopes... 
I'll be always with you...