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प्यार


मुश्किल है ये कितना मुझको...
लिख देना उन जज्बातों को...
लगता है की छुप जातें हैं...
जब खोजता हूँ उन लफ्जों को ||

वैसे तो बहुत बदनाम हैं...
ये प्यार करने वाले सब...
फिर बढती क्यूँ है प्यास मगर...
एक दिलबर के दीदार को ||

क्यूँ लगता है फिर मीठा ये...
जो दर्द कभीवो, हमको दे दे...
गर ना हो प्यार तो नफरत ही...
कुछ तो कभी वो हमसे कहदे...
क्यों है इतना दीवानापन...
देते हैं भुला हम खुद ही को...
और लगता है खो जाती हैं...
जब खोजते हैं इन वजहों को ||

खुशियाँ अपनी रम जाती हैं...
उसकी दुनिया की खुशियों में...
दिल कहता है की छीन ले...
गम उसके तू हर कीमत पे...
है किया इजाद हमने या फिर...
लेगा खुदा ही इस ज़िम्मे को ||

क्यूँ मुश्किल है इतना मुझको...
लिख देना उन जज्बातों को...
क्यूँ.. लगता है छुप जातें हैं...
जब खोजता हूँ उन लफ्जों को ||


अभय कुमार

खुदा

अनोखा ये एहसास है, खुद में मिल जाने का...
कमियों के बीच कहीं, पूरा सा दीखता हूँ...
व्यथाए कुछ कम हैं, द्वेष भी नहीं रहा ...
लगता है जैसे की, खुद को पा लिया ||


अब ना अकेला हूँ, जिन्दगी के सफ़र में...
जज्बा भी कहीं अब दीखता नहीं टूटता...
विश्वाश की डोर ये, कही तो बधीं है...
लगता है जैसे की, खुद को मैंने पा लिया ||

अब ना है निराशा, ना ही तो कमी है...
जवाब हर सवाल का, मुझमे ही कहीं है...
करम ये तेरा है, मेरा कुछ भी नहीं.... ऐ खुदा !!
लगता है जैसे की, तुझको मैंने पा लिया ||

                                    अभय कुमार
                                    १६ अप्रैल २०१५


समंदर

कहीं मैयत, तो कहीं महफ़िलें देखता हूँ...
कहीं धोखा तो कहीं लोग सच्चे देखता हूँ...
कहीं खिलती आँखे, तो कहीं आंसू देखता हूँ...
कहीं आलिशान महल तो कहीं ठिठुरते बच्चे देखता हूँ |

कहीं बेबस बुढ़ापा तो कहीं मधहोश जवानी देखता हूँ...
कहीं टूटते ख्वाब तो कहीं बुलंदियां झुकते देखता हूँ...
कहीं मोहोबत्त तो कहीं लम्बी रंजिशे देखता हूँ...
शांत वादियों में भी कभी बस्तियां लुटते देखता हूँ ||

कहीं अटूट विश्वाश तो कहीं टूटते मंदिर देखता हूँ...
घनघोर अंधेरों में भी कभी उजियारे अन्दर देखता हूँ...
देखता हूँ कभी, उफनती इस सागर की लहरों को...
बंद आँखों से कभी, खुद में ये समंदर देखता हूँ |||

By.... अभय कुमार
4 feb 2015

वो चाहत ही है, जो अंधेरी आंखों मे, उजाला भर देती है…वो चाहत ही है,जो खो जाय तो, इन आंखों मे आँसूओ का समंदर भर देती है॥

आँसू

शब्दों की तलाश मे, ये रात गुजर जायेगी…

कुछ बातों की आस मे, कायनात बदल जायेगी…

जब चाहतों की उसकी, सौगात चली जायेगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

इन रात के अंधेरों मे, मै रह रहा सा था कहीं…

तू प्यार का एक दीप जला, इक उजियारा सा कर गई…

जब लौ को बचाने मे, हथेलियां सुलग जायेंगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

प्यासा राही बनकर मै, भटकता रहा उन राहों में…

तू अक्सर मुझको प्रेम का, एक प्याला पिला जाती थी…

जब राहों से ओस की, वह बूदें सूख जायेंगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

भीड़ की आवाज भी, जब अनसुनी सी थी कहीं…

तब आहटों को भी तूने, इन सासों मे बसा दिया…

जब घुंघरुओ की छ्नछनाहट, ये आँगन छोड़ जायेगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

एहसास ना था धूप का, इस जलन का, उस आग का…

पर तेरे एक स्पर्श  ने, इस रूह को सहला दिया…

जब चाँद की शीतलता भी, इक ऊष्णता बन जायेगी…

तब चीखेंगे आँसू, और, बरसात सहम जायेगी॥

ना चाहता था जानना, इस मौसम को आकाश को…

ना तनहाइयों का फ़ीकापन, ना साथ की मिठास को…

जब दर्द भरे संसार मै, तू मुझको छोड़ जायेगी…

फ़िर ना चीखेंगे आंसू, पर, ये सांसे रूठ जायेंगी…॥


अभय कुमार

Never withdraw... in any situation... must be somewhere you'll find a way... trust in God and so as in yourself:)



"THE END"

In the glow of the day; there,
I saw the dark of night.
No way could I find anywhere.
Nor God did steer me to fight.

Nobody was awake to play the role,
In the city of love the fame and light.
The zombies were crying from well of coal,
No flame could light to shine bright.